19 साल की सान्वी को उसके ही दोस्त ने धोखे से बेचा। वहाँ उसका नाम नहीं, सिर्फ कीमत थी। हर रात उसकी दुनिया एक नई सज़ा बन चुकी थी। उसी अँधेरे में 28 साल का आर्यमान राणा आया। उसने सान्वी को खरीद लिया और वहाँ से ले गया, लेकिन हर दिन उसे यही एहसास दिलाता रहा — वह “खरीदी हुई” है। सान्वी की नफ़रत उसकी हर बात पर बढ़ती रही। फिर एक दिन सच सामने आया — सान्वी वहाँ सिर्फ दोस्त की गद्दारी की वजह से नहीं पहुँची थी, बल्कि आर्यमान के पुराने बदले का हिस्सा थी। अब सवाल यह है — क्या सान्वी सिर्फ बदले की कीमत थी, या दोनों पहले से ही एक ही दर्द की धुन में बंधे थे? और क्या ये नफ़रत कभी मोहब्बत में बदल सकती है… या दर्द हमेशा उन्हें अलग ही रखेगा?











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