
कमरे में हल्की-सी लाल रोशनी जल रही थी। पर्दे भारी थे, खिड़की बंद थी, और हवा में अजीब-सी खुशबू घुली हुई थी—इत्र, धुआँ और घुटन का मिला-जुला एहसास।
बिस्तर पर एक लड़की बेसुध पड़ी थी। उसके बाल बिखरे हुए थे, माथे पर हल्की चोट का निशान था, और हाथ ढीले होकर किनारे लटक रहे थे।
कुछ देर बाद उसकी उंगलियाँ हल्की-सी हिलीं।
साँस तेज हुई।
पलकें काँपीं… और फिर धीरे-धीरे खुलीं।
सान्वी ने छत को घूरकर देखा। सुनहरी नक़्क़ाशी वाला पंखा घूम रहा था। उसे समझ ही नहीं आया वो कहाँ है। उसका सिर भारी था, जैसे किसी ने अंदर पत्थर भर दिए हों।
वो झटके से उठने की कोशिश करती है—पर चक्कर खाकर फिर बैठ जाती है।
“मैं… यहाँ…?” उसकी आवाज़ सूखी और टूटी हुई थी।
वो कमरे को देखने लगी—चमकीले परदे, भारी आईना, कोने में सजी मेकअप टेबल, और दरवाज़े के बाहर से आती धीमी-धीमी हँसी… और ढोलक की थाप।
अचानक उसकी साँस अटक गई।
यादें जैसे बिजली की तरह कौंधीं—
अंधेरी सड़क…
कुछ लोग…
जबरदस्ती खींचना…
उसका दोस्त ज़मीन पर गिरा हुआ…
उसे बुरी तरह पीटा जा रहा था…
“सान्वी भाग!” उसकी दोस्त की टूटी आवाज़…
और फिर… किसी ने पीछे से उसके मुँह पर कपड़ा रख दिया…
सब कुछ काला।
सान्वी का दिल ज़ोर से धड़कने लगा।
“नहीं… नहीं…” वो बड़बड़ाई।
वो तुरंत उठी और दरवाज़े की तरफ बढ़ी। हाथ काँप रहे थे, लेकिन उसने कुंडी घुमाई। दरवाज़ा खुल गया।
बाहर लंबी-सी गैलरी थी। लाल-पीली लाइट्स, दीवारों पर बड़े-बड़े शीशे, और हवा में तेज़ संगीत।
गैलरी में कई लड़कियाँ खड़ी थीं—भारी मेकअप, चमकदार और बेहद खुली ड्रेसेज़ में। उनके चेहरे पर अजीब-सी मुस्कान थी।
कुछ लड़के वहाँ घूम रहे थे, हँसते हुए।
जैसे ही कोई लड़का किसी लड़की के पास आता, वो लड़की मुस्कुराकर उसका हाथ पकड़ती… और उसे अपने साथ कमरे की तरफ ले जाती।
सान्वी का गला सूख गया।
अब उसे समझ आ चुका था।
“ये… ये जगह…” उसकी आँखों में डर साफ दिख रहा था।
वो पीछे हटने लगी।
फिर अचानक मुड़ी और सीढ़ियों की तरफ दौड़ पड़ी।
“मुझे यहाँ से निकलना है… अभी…”
उसके कदम काँप रहे थे, लेकिन वो तेज़ी से नीचे उतरने लगी।
तभी—
अचानक किसी ने पीछे से उसके बालों को जोर से पकड़ा।
वो चीख पड़ी।
एक औरत की कर्कश हँसी उसके कानों में गूँजी।
“अरे-अरे… इतनी जल्दी क्या है?”
सान्वी ने गर्दन मोड़कर देखा—चटक साड़ी, भारी गहने, तीखी आँखें।
वो औरत उसे अपनी तरफ खींच रही थी।
सान्वी रोते हुए छूटने की कोशिश करने लगी।
“छोड़ दो मुझे! प्लीज़… छोड़ दो!”
औरत और ज़ोर से हँसी।
“तुझे छोड़ दूँ? ऐसे कैसे?”
उसने उसके ठोड़ी को पकड़कर चेहरा ऊपर उठाया।
“यहाँ आने के तो हजार रास्ते हैं, लेकिन जाने का एक भी नहीं समझी?”
सान्वी की आँखों से आँसू बह रहे थे। वो हाथ-पैर मार रही थी, लेकिन पकड़ मजबूत थी।
औरत ने धीमी आवाज़ में कहा—
“मैंने सोचा था आज रात तुझे आराम दूँगी… पर लगता है तू सीधी नहीं है। तेरी ट्रेनिंग अभी से शुरू करनी पड़ेगी।”
सान्वी ने पूरी ताकत से खुद को छुड़ाने की कोशिश की।
“मैं नहीं रहूँगी यहाँ! सुन रही हो तुम? मैं भाग जाऊँगी!”
औरत ने उसे झटका दिया।
“भाग के दिखा… हर दरवाज़े पर लोग खड़े हैं। नीचे से ऊपर तक सब मेरे हैं। तू जितना लड़ ले, पर यहाँ से बाहर नहीं जा पाएगी।”
सान्वी काँप रही थी… लेकिन उसकी आँखों में डर के साथ एक जिद भी चमक रही थी।
वो हार मानने को तैयार नहीं थी।
मगर उस जगह की दीवारें… और वो हँसती हुई आवाज़ें… साफ बता रही थीं—
ये कोई साधारण जगह नहीं थी।
ये वो दुनिया थी जहाँ से निकलना लगभग नामुमकिन था।
सान्वी अब भी औरत के हाथों में जकड़ी हुई थी। उसके आँसू बह रहे थे और वह बार-बार छूटने की कोशिश कर रही थी। औरत ने उसे झटके से छोड़ा और गैलरी में खड़ी एक लड़की की तरफ इशारा किया। वह लड़की तुरंत समझ गई और सीढ़ियों से नीचे चली गई।
दो मिनट भी नहीं हुए थे कि सीढ़ियों से दो भारी-भरकम आदमी ऊपर आए। उनके हाथों में कपड़े थे - चटकीले रंग के, चमकीले और बहुत पतले। उन्होंने वह कपड़ा औरत को थमा दिया।
औरत ने कपड़ा लिया और एक पल उसे देखा, फिर अचानक सान्वी के मुँह पर दे मारा।
"बदल इसे। अभी।"
सान्वी ने वह कपड़ा देखा - एक छोटी सी चोली, बहुत पतली और पारदर्शी, और इतनी छोटी कि ढकने के बजाय सब कुछ दिखाती। नीचे का कपड़ा भी ऐसा ही था। उसे देखते ही सान्वी की आँखें फटी रह गईं।
"नहीं... ये क्या है? मैं ये नहीं पहनूँगी!" सान्वी ने काँपते हुए कहा।
औरत की आँखों में गुस्सा आ गया। वह सान्वी के बहुत करीब आ गई।
"तू नहीं पहनेगी? तो ये दोनों पहना देंगे। समझी? मैं तुझसे पूछ नहीं रही, बता रही हूँ।"
सान्वी का दिल बैठ गया। उसने उन दोनों आदमियों की तरफ देखा - दोनों खड़े थे, सीना ताने, चेहरे पर बिल्कुल भाव नहीं। उनकी आँखें सान्वी को घूर रही थीं।
सान्वी अचानक झुकी और औरत के पैरों पर गिर पड़ी।
"मैं आपके पैर पड़ती हूँ... मुझे छोड़ दो... प्लीज़... मैं यह सब नहीं कर सकती... मैं मर जाऊँगी... प्लीज़..." उसकी आवाज़ टूट रही थी।
औरत ने उसे पैर से झटक दिया। उसने एक आदमी की तरफ देखा। बस एक इशारा था।
वह आदमी आगे बढ़ा और सान्वी को जमीन से उठा लिया। उसकी पकड़ ऐसी थी कि सान्वी हिल भी नहीं सकती थी। दूसरे आदमी ने सान्वी के कपड़ों के बटन खोलने शुरू कर दिए।
"नहीं! नहीं! मैं पहन लूँगी! मैं पहन लूँगी!" सान्वी चीख पड़ी।
औरत ने हाथ से इशारा किया और दोनों आदमी रुक गए।
"अब समझदार हो गई? तो जल्दी कर।"
सान्वी काँप रही थी। उसने उन आदमियों की तरफ देखा - वे अभी भी वहीं खड़े थे। उनके सामने कपड़े बदलने का ख्याल आते ही उसकी रूह काँप गई।
"वो... वो यहाँ हैं..." सान्वी ने हिचकते हुए कहा।
औरत ज़ोर से हँसी।
"हटो तो साहब, इसे शर्म आ रही है!"
दोनों आदमी मुस्कुराए, लेकिन वहाँ से नहीं हटे। औरत ने सान्वी की ठुड्डी पकड़ी और उसकी आँखों में देखा।
"सुन, यहाँ शर्म नाम की कोई चीज़ नहीं होती। अब फैसला कर - या तो इनके सामने कपड़े बदल, या ये तेरे कपड़े फाड़ देंगे। तेरी मर्ज़ी।"
सान्वी को लगा जैसे दुनिया थम गई हो। उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे, उसके हाथ काँप रहे थे। उसने उन आदमियों की तरफ देखा - दोनों की निगाहें उस पर थीं।
धीरे-धीरे, काँपते हाथों से, उसने अपने कुर्ते के बटन खोलने शुरू किए। पहला बटन खुला। दूसरा बटन खुला। उसकी गर्दन दिखी, फिर कंधे।
वह नीचे देख रही थी - वह उन आदमियों की तरफ नहीं देख पा रही थी। मगर वे देख रहे थे। हर बटन खुलने के साथ उनकी साँसें भारी हो रही थीं।
कुर्ता पूरा खुल गया। सान्वी ने झटके से उसे पीछे उतारा। वह अब सिर्फ अंदर के पतले कपड़े में थी - एक छोटी सी ब्रा जो उसके शरीर से चिपक रही थी। उसने बाहों से खुद को ढकने की कोशिश की, मगर वह मुमकिन नहीं था।
उन आदमियों की निगाहें उसके सीने पर टिकी थीं, उस ब्रा के उभार पर जो उसके यौवन को और उभार रहा था। सान्वी ने उनकी आँखों में वह चमक देखी।
"और नीचे का भी," औरत ने सख्त आवाज़ में कहा।
सान्वी ठिठक गई। उसकी आँखों से फिर आँसू बहने लगे।
"प्लीज़..."
औरत ने कोई जवाब नहीं दिया। बस उन आदमियों की तरफ देखा। वे एक कदम आगे बढ़े।
सान्वी ने चीखते हुए कहा, "नहीं! मैं उतार रही हूँ!"
उसने झटके से अपनी सलवार का नाड़ा खोला। उसके हाथ काँप रहे थे। आखिरकार वह खुल गया। सलवार नीचे सरकी और जमीन पर गिर गई।
सान्वी अब सिर्फ उस पतली ब्रा और एक छोटे से नीचे के कपड़े में खड़ी थी। उसकी टाँगें पूरी तरह नंगी थीं। उसकी जाँघें, उसके ass का किनारा - सब कुछ साफ दिख रहा था। ब्रा इतनी पतली थी कि उसके सीने का उभार और उसकी बनावट साफ झलक रही थी।
उन आदमियों की आँखें अब उसकी टाँगों पर थीं, उसके सीने पर, उस हर हिस्से पर जो उस ब्रा के नीचे छिपा भी था और दिखता भी था। उनके चेहरे पर एक अजीब सी मुस्कान थी। उनकी निगाहें उसके शरीर पर ऊपर से नीचे तक घूम रही थीं।
सान्वी को बहुत शर्म आ रही थी। वह अपने हाथों से खुद को ढकने की कोशिश कर रही थी - एक हाथ से अपने सीने को, दूसरे से नीचे के हिस्से को। मगर वह जानती थी कि यह बेकार है। वे सब कुछ देख चुके थे।
"अब ये पहन," औरत ने वह चमकीला, पतला कपड़ा उसकी तरफ बढ़ाया।
सान्वी ने काँपते हाथों से वह कपड़ा लिया। उसे पहनने का मतलब था - और भी ज्यादा उघड़ना। मगर अब उसके पास कोई चारा नहीं था। उन आदमियों के सामने, उनकी निगाहों के नीचे, उसने पहले अपनी पुरानी ब्रा के कन्धे उतारे। वह कपड़ा नीचे सरका और उसके सीने के उभार पूरी तरह खुल गए। उसने झटके से एक हाथ से खुद को ढका और दूसरे हाथ से नई चोली पहनने की कोशिश की।
उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे, उसका शरीर काँप रहा था, मगर वह चुप थी। वह जानती थी कि उसकी हर हरकत, उसका काँपता शरीर, उसकी नंगी त्वचा - सब कुछ उन आदमियों की आँखों के सामने था।
क्योंकि अब वह समझ चुकी थी - इस जगह पर उसकी कोई इज्जत नहीं थी, उसकी कोई मर्जी नहीं थी। यहाँ वह सिर्फ एक चीज़ थी। और यह सब उसकी नई ज़िंदगी की शुरुआत थी।




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